mobile me mahan jindagi me pareshan


 मोबाइल में महान, ज़िंदगी में परेशान

आजकल इंसान की असली पहचान उसके चेहरे से नहीं, उसके मोबाइल की बैटरी से होती है। बैटरी 100% हो तो आत्मविश्वास भी 100%... और जैसे ही 5% पर पहुँची, आदमी ऐसा चार्जर ढूँढ़ता है जैसे रेगिस्तान में प्यासा पानी ढूँढ़ता है। उस समय अगर कोई पूछ दे—"भाई, कैसे हो?" तो जवाब मिलता है—"पहले चार्जर बता... फिर जीवन की बात करेंगे!"



पहले लोग सुबह उठते ही भगवान का नाम लेते थे। अब आँख खुलते ही मोबाइल उठाते हैं। पहले प्रार्थना होती थी, अब नोटिफिकेशन। पहले आरती सुनाई देती थी, अब रील की आवाज़।

सबसे पहले देखा जाता है—कितने लाइक आए? किसने स्टेटस देखा? और सबसे बड़ा सवाल—उसने देखा, लेकिन रिप्लाई क्यों नहीं किया?


सोशल मीडिया ने पूरे देश को विशेषज्ञ बना दिया है। क्रिकेट का मैच हो तो हर आदमी चयनकर्ता, चुनाव हो तो हर आदमी राजनीतिक विश्लेषक, शेयर बाज़ार गिरे तो हर कोई अर्थशास्त्री और बारिश हो जाए तो पूरा देश मौसम विभाग बन जाता है।



ज्ञान इतना है कि अगर एक दिन इंटरनेट बंद हो जाए, तो आधे लोग अपने ही विचार भूल जाएँ।

अब बात सेल्फी की...

पहले लोग तीर्थ पर दर्शन करने जाते थे। अब दर्शन बाद में होते हैं, सेल्फी पहले। भगवान भी शायद सोचते होंगे—"बेटा, एक बार इधर भी देख लो... मैं भी यहीं हूँ!"



घूमने का उद्देश्य भी बदल गया है। पहले लोग यादें बनाने जाते थे, अब कंटेंट बनाने जाते हैं। खाना ठंडा हो जाए, कोई बात नहीं... फोटो गरम होनी चाहिए।



कुछ लोग तो ऐसे घूमते हैं कि लगता है छुट्टी मनाने नहीं, पड़ोसियों को जलाने निकले हैं।

दोस्ती भी अब वाई-फाई जैसी हो गई है। सिग्नल अच्छा हो तो घंटों बातें... नेटवर्क कमजोर हुआ नहीं कि—"भाई, बाद में बात करता हूँ।"



रिश्तों की मजबूती अब दिल से नहीं, डेटा पैक से मापी जाती है।

और राजनीति...

चुनाव आते ही नेता इतने विनम्र हो जाते हैं कि हर गली में हाथ जोड़कर मिलते हैं। ऐसा अपनापन दिखाते हैं कि लगता है बचपन से यही मोहल्ले में पले-बढ़े हैं।



लेकिन चुनाव जीतते ही वही नेता ऐसे गायब होते हैं कि जनता अगले पाँच साल तक उनका दर्शन करने के लिए चुनाव आयोग की तारीख़ का इंतज़ार करती रहती है।



हम जनता भी कम कलाकार नहीं हैं।

महँगाई पर दो घंटे बहस करेंगे, लेकिन "फ्लैश सेल" का नोटिफिकेशन आते ही उँगलियाँ इतनी तेज़ चलती हैं कि ओलंपिक वाले भी शर्मा जाएँ।

पार्सल घर आता है...

खोलते हैं...

और फिर पाँच मिनट तक उसे देखकर सोचते हैं—

"मैंने यह मंगाया क्यों था?"



मोबाइल ने एक और कमाल किया है।

पूरा परिवार एक ही कमरे में बैठा होता है...

चार लोग...

चार मोबाइल...

और चारों किसी पाँचवें आदमी से चैट कर रहे होते हैं।



घर में सन्नाटा ऐसा कि अगर वाई-फाई बंद हो जाए, तभी पता चलता है कि परिवार में कितने सदस्य रहते हैं।

मोबाइल की लत

पहले लोग घर की चाबी भूल जाते थे, अब मोबाइल भूल जाएँ तो आधे रास्ते से ऐसे लौटते हैं जैसे बच्चा स्टेशन पर छूट गया हो।

रील्स

रील्स इतनी देख ली हैं कि अब अगर कोई दो मिनट लगातार बात कर ले, तो मन करता है उसे स्किप कर दें।

गूगल मैप

पहले रास्ता पूछने से दोस्त बन जाते थे। अब गूगल मैप के कारण आदमी मंज़िल तक पहुँच जाता है, लेकिन किसी से पहचान नहीं होती।



पहले माँ कहती थीं—"बेटा, बाहर जाकर खेलो।"

अब कहती हैं—"बेटा, पाँच मिनट के लिए मोबाइल छोड़कर हमारी शक्ल भी देख लो।"

और सबसे बड़ा कमाल...

मोबाइल हमारे हाथ में है, लेकिन कंट्रोल उसका हमारे दिमाग़ पर है।

हम सोचते हैं कि हम मोबाइल चला रहे हैं...

सच तो यह है कि मोबाइल ही हमें चला रहा है।


इसलिए कभी-कभी मोबाइल को भी आराम दे दिया कीजिए।

क्योंकि ज़िंदगी की सबसे अच्छी "स्टोरी" सोशल मीडिया पर नहीं...

अपने लोगों के साथ बैठकर बनती है।



और याद रखिए...

मोबाइल स्मार्ट हो सकता है...

लेकिन अगर इंसान ही समझदार न रहा...

तो फिर स्मार्टफ़ोन का क्या फायदा?

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